जब-जब समय ने सत्य के स्वर को दबाना चाहा, तब-तब तुम्हारी कलम ने अंधेरों में दीप जलाया।
आज भले ही बाजार के शोर में तुम्हारी आवाज़ कहीं खोती सी लगे, पर कुछ लोग अब भी हैं जो तुम्हें जीवित रखने के लिए अपने शब्दों का रक्त बहा रहे हैं।
तुम्हारे साथ बिताए वर्षों की स्मृतियाँ घर के किसी पुराने कोने में रखी पीली पड़ चुकी डायरी जैसी हैं, जिन्हें खोलते ही अनगिनत चेहरे, संघर्ष और सपने फिर से जीवित हो उठते हैं।
पत्रकारिता, तुमसे किया गया प्रेम कभी पुराना नहीं होता। यह हर दिन एक नई तपस्या है, हर रात एक नया संकल्प है।
जब तक सत्य लिखने वाली एक भी कलम शेष है, जब तक अन्याय के विरुद्ध एक भी स्वर उठता है, तब तक तुम्हारी धड़कनें चलती रहेंगी।
और मैं.अपने जीवन की अंतिम सांस तक तुम्हारे बिखरे हुए अक्षरों को समेटता रहूँगा, क्योंकि मेरे लिए पत्रकारिता केवल एक शब्द नहीं, बल्कि आत्मा का सबसे पवित्र प्रेम है









