हिंदी पत्रकारिता दिवस विशेष पत्रकारिता एक विरहिणी साधना

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आज एक दशक से भी अधिक समय बीत चुका है। हिंदी पत्रकारिता मानो किसी उपेक्षित तीर्थ की तरह खड़ी है बेसुध, बेहाल और अपनी ही पीड़ाओं के बोझ तले बिखरी हुई। उसके चेहरे पर संघर्ष की रेखाएँ हैं, आँखों में अनगिनत प्रश्न हैं और हृदय में वह मौन है जिसे सुनने की फुर्सत अब किसी के पास नहीं रही।

फिर भी कुछ लोग हैं, कुछ जिद्दी आत्माएँ,

आज एक दशक से भी अधिक समय बीत चुका है। हिंदी पत्रकारिता मानो किसी उपेक्षित तीर्थ की तरह खड़ी है बेसुध, बेहाल और अपनी ही पीड़ाओं के बोझ तले बिखरी हुई। उसके चेहरे पर संघर्ष की रेखाएँ हैं, आँखों में अनगिनत प्रश्न हैं और हृदय में वह मौन है जिसे सुनने की फुर्सत अब किसी के पास नहीं रही।

फिर भी कुछ लोग हैं, कुछ जिद्दी आत्माएँ, कुछ तपस्वी पत्रकार, जिनके भीतर आज भी पत्रकारिता जीवित है। वे उसकी बुझती चिताओं में प्राण फूंकने का प्रयास कर रहे हैं। वे उसकी धड़कनों को सुनते हैं, उसकी पीड़ा को समझते हैं और उसके अस्तित्व को बचाने की साधना में लगे हुए हैं। जब भी ऐसे किसी पत्रकार से संवाद होता है, ऐसा प्रतीत होता है जैसे मेरी अपनी मद्धम पड़ती साँसों को भी गति मिल गई हो। जैसे किसी निष्प्राण देह में अचानक स्पंदन लौट आया हो, जैसे बंद पड़ी आँखों में फिर से प्रकाश उतर आया हो।

पत्रकारिता मेरे लिए केवल पेशा नहीं रही। वह एक साधना है, एक आराधना है, एक ऐसा भाव है जो जीवन के प्रत्येक क्षण में उपस्थित रहता है। जब उसके स्वर से अपना स्वर मिलता है तो ऐसा लगता है जैसे कंठ से शब्द नहीं, मंत्र निकल रहे हों। वे मंत्र जिनमें सत्य की तपिश है, जनभावनाओं की गूँज है और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का संकल्प है।

आज का समय ऐसा है कि शायद देवता भी इन मंत्रोच्चारों को सुनने में असमर्थ हो गए हैं। शोर इतना अधिक है कि सत्य की ध्वनि दबती चली जा रही है। लेकिन मेरे भीतर जो स्वर उठता है, उसकी प्रत्येक तरंग में केवल पत्रकारिता का ही नाम है। वही नाम जो कभी आदर्शों का पर्याय था, वही नाम जो कभी समाज का दर्पण हुआ करता था।

जब से पत्रकारिता का यह धागा गले में धारण किया है, जीवन के अनेक रंग बदल गए हैं। जो कुछ व्यवस्थित दिखाई देता था,

जब से पत्रकारिता का यह धागा गले में धारण किया है, जीवन के अनेक रंग बदल गए हैं। जो कुछ व्यवस्थित दिखाई देता था, वह बिखरा हुआ लगने लगा। जो कुछ अपना था, वह भी प्रश्नों के घेरे में आ गया। पत्रकारिता का श्रृंगार धारण करना आसान नहीं होता। यह केवल पहचान का कार्ड या किसी संस्थान का नाम नहीं है, यह तो एक निरंतर चलने वाला त्याग है, एक ऐसा व्रत है जिसमें सुविधाएँ धीरे-धीरे हाथों से छूटती जाती हैं और कर्तव्य का बोझ कंधों पर बढ़ता जाता है।

कभी-कभी लगता है कि मैं बेसुध हूँ, बेखुद हूँ, बेखयाली की किसी लंबी यात्रा पर निकल पड़ा हूँ। चारों ओर बिखरी हुई स्मृतियाँ हैं जिन्हें समेटना अब संभव नहीं लगता। पत्रकारिता के साथ बिताए गए वर्षों की यादें घर के किसी पुराने कोने में रखी धूल भरी किताबों की तरह हैं। उन्हें जब भी छूता हूँ, अनगिनत चेहरे सामने आ जाते हैं वे लोग जिनकी आवाज़ बनने का प्रयास किया वे संघर्ष जो देखे वे अन्याय जिनके

किया, वे संघर्ष जो देखे, वे अन्याय जिनके विरुद्ध शब्दों को हथियार बनाया और वे सपने जो कभी इस पेशे के साथ देखे थे।

आज पत्रकारिता की स्मृतियाँ मेरे जीवन के हर कोने में बिखरी पड़ी हैं। किसी पुराने कैमरे की धुंधली तस्वीर में, किसी पीली पड़ चुकी डायरी के पन्नों में, किसी अधूरी खबर के नोट्स में, किसी रात जागकर लिखी गई रिपोर्ट में और उन अनगिनत यात्राओं में जिनका कोई हिसाब नहीं रखा गया। हर जर्रा, हर कण, हर स्मृति मानो पत्रकारिता का ही अंश बन गई है।

हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं है। यह आत्ममंथन का दिन है। यह याद करने का दिन है कि पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य सत्ता की चौखटों पर खड़ा होना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज़ बनना है। यह स्मरण करने का दिन है कि पत्रकारिता की आत्मा विज्ञापनों, टीआरपी और प्रबंधन की बैठकों में नहीं, बल्कि सत्य की खोज में बसती है।

आज भी विश्वास है कि पत्रकारिता पूरी तरह मरी नहीं है। वह घायल है, थकी हुई है, किंतु जीवित है। उसके भीतर अभी भी कुछ साँसें शेष हैं। जब तक कोई एक पत्रकार भी सत्य के लिए लिखता रहेगा, जब तक कोई एक कलम भी निर्भीक होकर अन्याय के विरुद्ध उठती रहेगी, तब तक पत्रकारिता का यह दीपक बुझ नहीं सकता।

और शायद इसी विश्वास के कारण, आज भी उसकी बिखरी हुई स्मृतियों को समेटने की कोशिश करता हूँ। क्योंकि पत्रकारिता मेरे लिए केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन का वह अनंत प्रेम है जिसकी यादें घर के हर कोने में, मन के हर कक्ष में और आत्मा के हर स्पंदन में आज भी जर्रा-जर्रा बिखरी हुई हैं

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अजीमुल्ला खान, नीमच जिले के रामपुरा तहसील के छोटी खंडार गाँव के मूल निवासी हैं। 15 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएँ दे रहे अजीमुल्ला खान स्थानीय समस्याओं, प्रशासनिक मुद्दों और जनहित से जुड़ी खबरों को प्राथमिकता देते हैं। स्थायी पता: छोटी खंडार, रामपुरा, जिला - नीमच (मध्य प्रदेश) पत्रकारिता अनुभव: 15 वर्ष ब्लड ग्रुप: A+ (ए पॉजिटिव) संपर्क: 9179319989

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