होती दिखाई दे रही है। भारतीय जनता पार्टी में लगातार कांग्रेस पृष्ठभूमि के नेताओं की बढ़ती सक्रियता अब पार्टी के पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को अखरने लगी है।
हाल ही में आयोजित विधायक कार्यालय उद्घाटन कार्यक्रम में यह नाराजगी खुलकर सामने आती नजर आई। वर्षों से भाजपा का झंडा उठाने वाले कई समर्पित कार्यकर्ता या तो कार्यक्रम में दिखाई नहीं दिए या फिर मंच से दूर दर्शक दीर्घा में बैठे नजर आए। वहीं दूसरी ओर हाल ही में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए नेताओं को मंच पर सम्मान और प्राथमिकता मिलती दिखाई दी।
भाजपा के कई पुराने कार्यकर्ताओं में यह चर्चा आम रही कि “जो कार्यकर्ता वर्षों से पार्टी के लिए संघर्ष करते रहे, आज वही उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं।” कुछ कार्यकर्ताओं ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि पार्टी में अब निष्ठा से ज्यादा “नए समीकरणों” को महत्व दिया जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आगामी नगरी निकाय चुनाव में भाजपा को अंदरूनी असंतोष का नुकसान उठाना पड़ सकता है। विगत 20 वर्षों से नगर की सत्ता पर काबिज भाजपा के सामने इस बार सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं बल्कि अपने ही नाराज़ कार्यकर्ता बन सकते हैं।
स्थिति यह है कि भाजपा के कई वरिष्ठ और अनुभवी पदाधिकारी अब पार्टी कार्यक्रमों से दूरी बनाने लगे हैं। संगठन के पुराने चेहरे मंच से गायब हैं और कार्यकर्ताओं में उत्साह की जगह निराशा दिखाई देने लगी है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा नेतृत्व समय रहते अपने पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर कर पाएगा या फिर “अपनों की उपेक्षा” आगामी चुनाव में पार्टी की मुश्किलें बढ़ाएगी?









