भाजपा ट्रिपल इंजन सरकार के दम पर मैदान में, कांग्रेस यशवंत परिवार की विरासत पर लगा सकती है दांव; चुनावी रण में दिलचस्प मुकाबले के आसार
रामपुरा नगर परिषद निकाय चुनाव इस बार बेहद रोमांचक और प्रतिष्ठा का विषय बनता नजर आ रहा है। एक ओर भारतीय जनता पार्टी 15 वर्षों के अपने शासनकाल और प्रदेश से लेकर केंद्र तक की ट्रिपल इंजन सरकार के दम पर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस अपने पुराने जनाधार और विकास कार्यों की विरासत के सहारे भाजपा को कड़ी चुनौती देने की रणनीति बना रही है।
राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक चर्चा पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष यशवंत करेल के परिवार को लेकर है। नगर के विकास में उनकी भूमिका को देखते हुए आज भी बड़ी संख्या में लोग उनके कार्यकाल को रामपुरा का “स्वर्णिम युग” मानते हैं। पेयजल योजनाओं से लेकर नगर के विजय द्वार, सड़कें, बस स्टैंड, कृषि उपज मंडी नगर को तहसील की उपलब्धि सहित कई महत्वपूर्ण विकास कार्य उनके कार्यकाल में हुए, जिनका जिक्र आज भी नगरवासी करते हैं।
सूत्रों की मानें तो यशवंत करेल के स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के कारण कांग्रेस इस बार उनके पुत्र मोनू यशवंत करेल पर दांव खेल सकती है। यदि ऐसा होता है तो चुनावी मुकाबला और भी दिलचस्प हो जाएगा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आरक्षण का समीकरण अनुकूल रहे या प्रतिकूल रहने पर मोनू केरल कांग्रेस के सबसे बड़े दिव्यास्त्र साबित हो सकते हैं जिसका विकल्प खोजना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती हैं।
मोनू करेल की पहचान एक सरल और मिलनसार युवा नेता के रूप में है। युवाओं के बीच उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। साथ ही उन्हें अपने पिता की लोकप्रियता और वर्षों से बने जनसंपर्क का लाभ भी मिल सकता है। वहीं दूसरी तरफ यशवंत ब्रिगेड में ऐसे मजे हुए सीपेसालार हैं जो 10 वर्ष सत्ता से दूर रहने के बाद भी किसी भी राजनीतिक घटनाक्रम को बदलने में माहिर है खुले शब्दों में कहें तो यशवंत ब्रिगेड में विदुर से लेकर चाणक्य तक बड़े-बड़े दिग्गज यशवंत ब्रिगेड के पास उपलब्ध हैं यही वजह है कि कांग्रेस यदि उन्हें उम्मीदवार बनाती है तो भाजपा को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।
पिछले चुनाव में भी यशवंत करेल अस्वस्थ होने के बावजूद कांग्रेस के पक्ष में कई वार्डों में प्रभावी साबित हुए थे। ऐसे में इस बार यदि पूरा परिवार सक्रिय रूप से चुनाव मैदान में उतरता है तो रामपुरा की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है।
हालांकि भाजपा भी संगठनात्मक मजबूती, सरकार की योजनाओं और बड़े नेताओं के समर्थन के भरोसे चुनावी रण में उतरने को तैयार है। अब देखना यह होगा कि रामपुरा की जनता विकास के पुराने मॉडल पर भरोसा जताती है या फिर भाजपा के 15 वर्षों के शासन पर अपनी मुहर लगाती है।
फिलहाल इतना तय है कि रामपुरा नगर परिषद का चुनाव इस बार “भाजपा बनाम यशवंत ब्रांड” की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है और आने वाले दिनों में राजनीतिक सरगर्मियां और तेज होने वाली हैं।









